'आवाज़ें' (कहानी)

आवाज़ें  (कहानी)
******************************************
कैलाश अग्निहोत्री जी को इस अपार्टमेंट में रहते-रहते बीस वर्ष हो चुके हैं इसलिए कॉरिडोर में गूँजने वाली सभी आवाज़ों से भली-भांति परिचित हो चुके हैं।बैडरूम से ही सुनकर बता सकते हैं कि कौन किस के साथ हँसी-ठिठोली कर रहा हैं,कौन किससे लड़ रहा है या लड़ रही है।
देखते-देखते युवा दंपत्ति अधेड़ हो गए।बच्चे बड़े हो गए।बाहर पढ़ने चले गए।बच्चों की धींगामस्ती की आवाज़ें कुछ समय के लिए लुप्त हो गईं थीं फिर कुछ ने अपने फ्लैट्स बेच दिए।कुछ नए लोग रहने आ गए।कुछ ने अपने फ्लैट्स किराए पर चढ़ा दिए।फिर खिलखिलाती,उदंडी,शरारती आवाज़ें गूँजने लगीं।
पंछियों की आवाज़ें तो यथावत सुरीली ही रहती हैं सिवाय कौव्वे के लेकिन उसमे भी क्रोध की ध्वनि नहीं आती।
पीछे से बहने वाले नाले से नाले वाली हिकारत नहीं आती क्योंकि वो काफी चोड़ा और बहता हुआ है।आकाश से ग्लाइड करते हुए रंग-बिरंगे पंछी उसमे अपना आहार ढूँढ़ते हैं।आजकल पानी कम है तो गुलाबी लंबे पैरों वाले पंछी उसमे ठुमक-ठुमक चहलकदमी करते हुए अपना शिकार ढूँढ़ लेते हैं।कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें भी हैं जो सुअरों को भगा देते हैं।जब नगरनिगम वाले पकड़ने आते हैं तब सुअरों की चीखती-चिल्लाती वीभत्स आवाज़ें भी आती हैं।
मिसेस तेजवानी की आवाज़ तो इतनी तेज और तीखी है कि लगता है रोम-रोम में छिद्र कर देगी।मिसेस बड़तोनिया तो ऐसे हँसती हैं जैसे कोई ढोल फट गया हो।बेवड़े मिरचंदानी की घरघराती,नशीली,कर्कश आवाज़ भी रात में गूँजती है "खोल हरामजादी,खोल दरवाजा।"उसकी बीवी उसके पियक्कड़ स्वभाव के चलते दरवाज़े के पीछे-पीछे ही आँसू बहाती  है और बाहर हँसती रहती है।आँसुओं की भी कोई आवाज़ होती तो वो भी सुनाई देती।कैलाश जी की मोटी, साँवली कामवाली बाई गुलाब के मुँह में तो जैसे लाउड स्पीकर लगा हुआ है।वह हर राष्ट्रीय,अंतराष्ट्रीय,सामाजिक,राजनैतिक विषयों पर अपनी ऊँची आवाज़ में टाँग ज़रूर अड़ाती है।
तेजवानी साहब भी अक्सर काम पर जाने से पहले अपने सेकंड फ्लोर के किचन की खिड़की से और सिकरवार अपने ग्राउंड फ्लोर के फ्लैट के पीछे बनाये बगीचे से चिल्ला-चिल्ला कर हवाई बातें करते हैं।जैसे सिकरवार पूछेगा की "आज क्या बना रहे हो कन्हैय्या?"(वो उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं) तो तेजवानी साहब बोलेंगे कि "पच्चीस किलो गाजर का हलवा बना रहा हूँ।" इन अनचाही आवाज़ों से कैलाश जी की तारतम्यता तो टूटती है और तकलीफ भी होती है मगर उतनी ही जितनी आफ्टर शेव लगाने के बाद होती है फिर आनंद आने लगता है।एक मध्यमवर्गीय जीवंत माहौल तो बना रहता है।कुछ किरायेदार भी आते हैं और बिना परिचय हुए बेआवाज़ ही चले भी जाते हैं।जब भी कोई लोडिंग ऑटो आता है तो समझ जाओ कि कोई आया या कोई जा रहा है।
पिछले वर्ष एक बिहारी परिवार ने फर्स्ट फ्लोर पर एक फ्लैट खरीद लिया था।रेलवे में कार्यरत वह व्यक्ति ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित था इसलिए ठीक से बोल नहीं पाता था लेकिन आते-जाते दुआ-सलाम कर लेता था।जब उसकी हालत बिगड़ी तब गाँव से उसके माँ-बाप आ गए थे। उसके धोती-कुर्ते वाले पिताजी की बुलंद आवाज़ फ्लैट के भीतर से भी सुनाई देती थी और पूरा कॉरिडोर थर्रा जाता था।वो इतनी बुलंद आवाज़ में जय श्री राम करते थे कि कैलाश जी अंदर तक कांप जाते थे इसलिए उसके बाद कैलाश जी ही उन्हें जय श्री राम करने लगे थे।प्रतिउत्तर के जय श्रीराम में उतनी बुलंदी नहीं रहती थी।ढंड के दिनों में वो सीढियां चढ़ते-चढ़ते धूप सेंकने के लिए छत तक पहुँच जाते थे।दो महीने पहले वो पीड़ित गुजर गया।उसकी पत्नी को रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति मिल गयी है।अब वो नए होंसलों के साथ ज़िन्दगी को आगे बढ़ा रही है।
आज कैलाश जी को एक कांच टूटने की आवाज़ तो आयी थी।इतने वर्षों में खिड़कियों के कांच भी ढीले हो चुके हैं,शायद कोई गिरा हो।लेकिन उसके बाद नीचे के फ्लोर वाली मिसेस बड़तोनिया,मिस्टर बड़तोनिया,तेजवानी,शर्मा और कुछ लोगों के लड़ने के मिश्रित स्वर बा आवाज़-ए-बुलंद कॉरिडोर में गूँजने लगे।इन आवाज़ों में एक उग्र,उत्तेजित पुरुष का क्रोध भरा अपरिचित स्वर भी था जो बाहरी लग रहा था।
जिज्ञासावश कैलाश जी दरवाज़ा खोलकर बाहर निकलने को हुए ही थे कि पत्नी अवंतिका ने कनखियों से ही उन्हें अंदर ही रहने की नसीहत दी।फिर दुनियादारी का पाठ पढ़ाते हुए बोली "जब वो अपने मामले में कुछ नहीं बोलते और दरवाजा बंद कर लेते हैं तो अपन क्यों जबरन उनके पचड़े में पड़ें।"
वैसे भी वो कई बार कैलाश जी का आत्मविश्वास ये कहकर डिगा चुकी है कि "ऐसे मामलों में तुम्हारे व्यक्तव्य कोई बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं होते।तुम तो न बोलो यही अच्छा है।"अब तो वह भी अपना आत्मविश्वास खोकर स्वयं को एक  कमजोर दुनियादार मानने लगे हैं।
लड़ने-झगड़ने के स्वर बढ़ते देखकर अवंतिका भी नीचे उतरी फिर कैलाश जी भी आ गए।पता पड़ा एक बाहरी व्यक्ति फर्स्ट फ्लोर पर रहने वाले दंपत्ति के बच्चों को अपने बच्चे बता रहा है व उनकी अनुपस्थिति में जब वो नौकरी पर गए हुए हैं जबरन अपने साथ ले जाने की कोशिश कर रहा है।वो बच्चों को उनके नाम से पुकार रहा है।उसने बंद दरवाज़े पर कई लात भी मारी और बाथरूम की खिड़की के कांच भी तोड़ दिए जो जीने पर खुलती है।
कैलाश जी का फ्लैट पीछे की तरफ है।वहाँ ये खिड़की आसमान में खुलती है।उसका एक कांच अपने खांचे में से ऊपर खिसक गया है और एक कांच टूट गया है तो सिर्फ आकाश में उड़ते पंछियों द्वारा ही नग्न देखे जाने की संभावना बनती है।एक बार अवंतिका ने कैलाश जी से एक कबूतर की शिकायत भी की थी कि वो खिड़की में बैठकर उसे नहाते हुए अपनी एक आँख से टुकुर-टुकुर देख रहा था।कैलाश जी सुनकर गाने लगे "ऐसे को रोके अब कौन भला,देखो जी तुम्हारी यही बतियाँ मुझको हैं तड़पाती।"
इधर वो तथाकथित,स्वम्भू बाप एवं बाहरी व्यक्ति आठ वर्षीय बड़ी लड़की को बात करने के लिए उस बाथरूम की  खिड़की पर बुला रहा है लेकिन वो इतनी डरी हुई है कि आने को तैयार ही नहीं है।वो किसी को मोबाइल पर बता रहा है कि "बच्चे मिल गए हैं।"गमछा बाँधे हुए जो दो व्यक्ति उसके साथ आये थे अपार्टमेंट का विरोध देखकर कहीं इधर-उधर हो गए हैं।
आज आपसी मनमुटाव,अंतर्विरोध भुलाकर एकजुटता का परिचय देने का समय था।अपार्टमेंटवासी उसके विरोध में उतर आए हैं कि "आप किसी और के बच्चों को जबरन नहीं ले जा सकते हैं,हम पुलिस रिपोर्ट कर देंगे।"परंतु उस बाहरी व्यक्ति की ज़िद में एक सच्चाई भी दिख रही है जो इतने लोगों से अकेला भिड़ गया है।उसने यह कहकर कि "भले ही वो (उसकी पत्नी) उस आदमी के साथ रहे लेकिन मैं अपनी बेटियों को उस आदमी के पास नहीं छोड़ सकता।"कुछ सहानुभूति भी जुटा ली है।एक पिता की विवशता व बच्चों के प्रति प्रेम व सुरक्षा के तर्क ने विरोध,अविश्वास की मोटी बर्फ थोड़ी पिघला दी है।संदेह की धुन्ध थोड़ी-थोड़ी छटी।वैसे अपार्टमेंट वालों ने फ्लैट के मालिक शर्मा जी को भी फ़ोन करके बुला लिया है।
अभी एक महीने पहले ही अठाइस-तीस वर्षीय दंपत्ति ने ये फ्लैट किराए पर लिया था और पिछली रात उनकी कार की खिड़की का कांच रात में किसी ने फोड़ दिया था।इस दुर्घटना ने अन्य रहवासियों को भी अपने वाहनों के प्रति चिंतित कर दिया था लेकिन उन्हें अब निश्चित हो चुका था कि ये किसी एक के प्रति किया गया इर्शापूर्ण कृत्य है।
अपार्टमेंट में सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी व वाक्चातुर्य से परिपूर्ण, अंधों में कानी रानी अवंतिका देर से मैदान में उतरी है पर अब कमान अपने हाथों में ले ली है।उसने अब दूध का दूध और पानी का पानी करने की ठान ली है।वो जीने पर बैठकर डरे-सहमे बच्चों में से बड़ी लड़की को बाथरूम की खिड़की पर बुला रही है व उनका हौंसला भी बढ़ा रही है कि बाथरूम की खिड़की पर आ जाओ,कुछ नहीं होगा,हम सब हैं ना!"उसने बड़बड़ाते हुए बाहरी व्यक्ति को डांट भी दिया कि "चुप हो जाइए,मैं लड़की को बुला रही हूँ न!"
बड़ी लड़की बाल्टी पर चढ़कर खिड़की में से अपना मुँह दिखाती है।उसको देखते ही बाहरी व्यक्ति भी उससे बात करने की कोशिश करने लगता है और बोलता है कि "दरवाजा खोलो तान्या ,मैं तुम दोनों को लेने आया हूँ।"मगर लड़की हिचकियों से रो रही है।अवंतिका फिर उसे डाँट देती है।
अवंतिका लड़की से पूछती है कि "क्या यही तुम्हारे पापा हैं और बाहरी व्यक्ति को अपना चेहरा दिखाने के निर्देश देती है।"लड़की डरते-डरते हाँ तो करती है परंतु उसे यहाँ से भगाने के लिए बोलती है।लड़की अवंतिका को बताती है कि उसके मोबाइल में बैलेंस नहीं है इसलिए मम्मी से कांटेक्ट नहीं कर पा रही है।अवंतिका उसकी मम्मी का मोबाइल नंबर पूछकर उसे कॉल करती है और वस्तुस्थिति से अवगत कराने के बाद बेटी से बात करवाती है।।मम्मी आश्वस्त करती है कि "हम थोड़ी देर में आ रहे हैं,दरवाजा मत खोलना।"
थोड़ी देर में वो दंपत्ति पुलिस को लेकर हाज़िर होते हैं।सफेद बालों वाले ,सेवानिवृत्ति के करीब दो पुलिसवाले उस बाहरी व्यक्ति को अपनी गाड़ी में बिठा लेते हैं।उन दंपत्ति को भी ले जाना है लेकिन उन्हें बाहर आने में थोड़ा वक्त लग रहा है।कैलाश जी पुलिसवाले से कुछ जानकारी जुटाने की कोशिश करते हैं तो पता पड़ता है कि ये केस तो बहुत पुराना है "आपको पता ही नहीं!" कैलाश जी नई जानकारी मिलते ही पत्नी अवंतिका के सामने इठलाते हुए यह जानकारी साझा करते हैं मानो बता रहे हों कि "मैं भी इतना कमजोर दुनियादार नहीं हूँ जितना तुम समझती हो।"
अपार्टमेंटवासी भी उनके बाहर निकलने की प्रतीक्षा में सीढ़ियों और कॉरिडोर में जमे हुए हैं।थोड़ी देर में रोती हुई  मम्मी छोटी बच्ची को गोद मे लेकर और बड़ी लड़की का हाथ थामे बाहर आती है और अपार्टमेंटवासियों से हाथ जोड़कर गुहार करती है कि "ये हमारा तीसरा फ्लैट है,प्लीज़ हमे यहाँ रहने दीजिए।इसने बहुत परेशान कर दिया है।"और सीढियां उतर जाती है।इसके बाद साथ रहने वाला शख्स भी शर्माता,झेंपता निकलता है।अवंतिका पूछ बैठती है कि "अगर वो बाप है तो आप कौन हो?" वो बताता है कि "इसके कोई न माँ न बाप न भाई,बहन,मैं इन्हें सपोर्ट कर रहा हूँ।"
"तो क्या डिवोर्स हो चुका है?" एक अपार्टमेंटवासी पूछ लेता है।
"नहीं,अभी केस चल रहा है।"ये बोलकर वो भी सीढियां उतर जाता है।
अपार्टमेंटवासियों के समक्ष रिश्तों का पटाक्षेप हो चुका है।मिरचंदानी के आठ वर्षीय तेज-तर्रार चिबल्ले बच्चे ने पहले ही एक खुफिया जानकारी मुहैया करवाई थी कि तान्या अपने पापा को पापा नहीं भैया बोलती है लेकिन तब लोगों ने उसको इतनी गंभीरता से नहीं लिया था।
अब महिलाओं पुरषों में नैतिकता,व्यभिचार जैसे विषयों पर विश्लेषणों का दौर चल निकलता है।अधिकांश का निष्कर्ष यही निकल रहा है कि "औरत बहुत तेज है,स्मार्ट,हैंडसम,पैसेवाला मर्द मिला तो पति को छोड़ दिया।वो भी कोई दो बच्चों की माँ से शादी थोड़े ही करेगा।दोनो एक ही डिपार्टमेंट में हैं।अच्छी-खासी सैलरी उठाते हैं।ये लिव-इन वाले ज्यादा किराया देते हैं।पहले तो अपनी अकड़ में ही रहती थी,किसी से बात तक नहीं करती थी और देखा आज कैसे गिड़गिड़ा रही थी।"अवंतिका ने अपना पक्ष रखा कि "आप लोग देख ही चुके हो वो कितना गुस्सेवाला है,हो सकता है मारता-पीटता हो इसलिए छोड़ दिया हो।" लेकिन अधिकांश की मानसिकता से यही आवाज़ें उठ रही थीं कि "औरत चरित्रहीन है।"

कपिल शास्त्री।

Comments

Popular posts from this blog

नानीजी का घर (किस्से-दर-किस्से)

चांटा (लघुकथा)

'नहीं...कभी नहीं' (कहानी)