नानीजी का घर (किस्से-दर-किस्से)
नानीजी का घर :किस्से-दर-किस्से ******************************************** नानीजी का घर यानी बाई-पिताजी का घर। ये संबोधन रिश्तों के हिसाब-किताब से नहीं बल्कि जो जिस नाम से सर्वाधिक सदस्यों द्वारा कुनबे में पुकारा जाता था वही हो जाता था। जैसे नानीजी की भी मम्मी यानी मेरी परनानी को सब भाभी बोलते थे क्योंकि उनके देवर उन्हें भाभी बोलते थे। मम्मी और पाँचो मामाजी द्वारा यही बाई-पिताजी संबोधन प्रयुक्त होता था जबकि हम भाई-बहन अपने पिताजी को बापाजी बोलते थे क्योंकि कभी मुम्बई के गुजराती बहुल इलाके भूलेश्वर में रहने के कारण वही बोलने की आदत पड़ गयी थी ऐसा मम्मी ने बताया था। भारत की आर्थिक राजधानी बम्बई जो अब मुम्बई हो चुकी है की जलवायु मम्मी को रास नहीं आयी और मन हमेशा अपनी माँ के पास वापस भोपाल आने को ही तरसता रहा।उनकी ज़िद के आगे अन्तोगत्वा हमारे क्रोधी मगर संवेदनशील बापाजी पंडित विनोद चंद्र शास्त्री ने भी समर्पण कर दिया था। संस्मरण में ही इसे किस्सागोई कह सकते हैं। हालाँकि किस्से सच्चे-झूठे हो सकते हैं परंतु यहाँ ये किस्से इस मायने में हैं कि यह मैंने मम्मी और मामाजी के मुँह से सुने हुए हैं। क...