चांटा (लघुकथा)

'चांटा' (लघुकथा)
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"मम्मी मैं तो पढ़ने में भी कमजोर थी और शरारती भी बहुत थी इसलिए मैंने आपसे कई बार चांटे खाये हैं लेकिन आप तो इंटेलिजेंट थीं,क्या आपने भी कभी अपनी मम्मी से चांटा खाया है?"
"हाँ,बारह साल की ऊमर में दो चांटे खाये थे।"
"क्यों?"
"मुझे तीन साल की ऊमर में ननिहाल छोड़ दिया गया था।रात में मुझे सोता हुआ छोड़कर चले गए थे।सुबह जब उठी तो मैं मम्मी..... मम्मी...पापा... पापा चिल्लाकर गेट की तरफ भागी थी।नानाजी ने नौकर को गेट लगाने का आर्डर दे दिया था।मैं गेट बजाती रही।फिर मौसी जबरदस्ती गोद में उठा कर अंदर ले गईं।इसीलिए जब भी देवदास देखती हूँ तो अंत में वो पारो के भागने वाले सीन को देखकर एक सिहरन सी होती है।
चार साल बाद जब मैं थोड़ी बड़ी हो गयी तो वापस बुला लिया गया था लेकिन एक फाँस तो चुभ गयी थी।मम्मी से मैंने पूछा भी था कि "सिर्फ मुझे ही क्यों छोड़ा गया,गुड्डू और मुन्नी को क्यों नहीं?"
मम्मी का जवाब और चुभने वाला था कि "गुड्डू तो लड़का है,वो हमारे लाड़ का है,उसे कैसे छोड़ सकते थे!और मुन्नी छोटी थी।और तुम्हें कौनसा जंगल में छोड़ दिया था!"
"फिर"
"फिर मैं अपनी उमर से भी बड़ी हो गयी थी। बारह साल की उमर में मैंने एक फैसला सुनाया था कि मैं सिर्फ एक बच्चा पैदा करूँगी।"इस पर एक चांटा पड़ा था कि इतनी छोटी सी ऊमर में बच्चे की बात कर रही हो!बेशरम कहीं की।"
"और दूसरा?"
"दूसरा इसके ठीक बाद ही तब पड़ा जब मैंने ढीट जैसे कहा "सिर्फ एक लड़की पैदा करूँगी और उसे बहुत प्यार करूँगी।"

कपिल शास्त्री।

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