दूसरी विदाई (लघुकथा)
दूसरी विदाई'
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"आज तो बड़ी शांति है,लगता है बड़बोला गुलाब खिला ही नहीं"बैडरूम में पेपर पढ़ने के बाद रजत ने पत्नी मानसी से धीरे से पूछा तो उसने इशारे से चुप रहने के लिए कहा कि कहीं चौके तक आवाज़ पहुँचकर दुखती रग पर चोट न करदे।
गुलाब तो कभी उदास नहीं दिखी,बल्कि आत्मविश्वास से लबरेज़ रोज़ उन्हें काम्प्लेक्स देकर ही जाती थी।मोटी, सांवली रंगत की ,बहुत बड़बोली गुलाब उनकी कामवाली बाई है।बीसी खेल-खेल कर जीती हुई राशि से भविष्य के लिए एफ.डी. करवा लेने वाली गुलाब को गरीबी रेखा के नीचे वालों को सरकार द्वारा दी गयी सभी योजनाओं की भी जानकारी है एवं उसका लाभ उठा रही है।होली-दिवाली आने से पहले ही वह अन्य घरों के दरियादिली के किस्से सुनना शुरू कर देती है।तीज-त्योहारों पर मंदिरों में होने वाले कोई भंडारे नहीं छोड़ती है।
चलती हुई बातचीत के बीच हर सामाजिक,राजनीतिक,धार्मिक,व्यक्तिगत,स्वास्थ्य,चिकित्सा संबंधी,राष्ट्रीय,अंतरराष्ट्रीय विषयों में काम करते करते ही वह टाँग ज़रूर अड़ाती है।वह उन्हें मोबाइल पर शांति से बैठने भी नहीं देती।उसके आने से पहले ही रजत और मानसी पर एक मानसिक दवाब बन जाता है।
गुलाब की बेटी शिखा परित्यक्ता है परंतु इस शब्द से जुड़ी सहानुभूति वाला भाव उसके आसपास भी नही फटकता।ज़माने की ऐसी की तैसी वाला भाव ही उन दोनों को मस्त रखता है।कभी गुलाब नहीं आती है तो शिखा काम कर जाती है।वह मानसी को स्पष्ट कर चुकी है कि जिन घरों में अकेले मर्द हैं वहाँ वो शिखा को नहीं भेजती।मानसी के कभी मायके चले जाने पर रजत का मामला अपवाद है परंतु उन माँ-बेटी को इतनी बेरुखी भी पसंद नहीं।उसके बड़बोलेपन ने ही बताया था कि "शिखा को बेटी हो जाने पर ससुराल वालों ने बदचलन बताकर पल्ला झाड़ लिया और वापस ही नहीं ले गए।"वो बेटी के तलाक का केस भी लड़ रही है।
उसके जीवन के कई पात्र रजत-मानसी के लिए अदृश्य होते हुए भी जीवंत हैं।जैसे शिखा के जीवन मे रेलवे में कार्यरत एक पुरुष आ गया है जो उससे बहुत प्रेम करता है और हाथ थामने को तैयार है और उसको भी सास का सम्मान देता है।शादी के बाद वह उन दोनों को काम नहीं करने देगा इसलिए अब उसकी योजना कुछ चुनिंदा कम सदस्यों वाले घर रखने की ही है।गुलाब का पति मनमौजी है,जब इच्छा होती है साइट पर जाता है और अक्सर दारू पीने के बाद गुलाब से मुर्गा बनवाकर खाता है।उसे इस अधेड़ावस्था में भी छेड़ने वाला एक अधेड़ मनचला मिल गया था जिसकी उसने चप्पल से पिटाई की थी।
शिखा भी अपनी माँ की तरह मोटी, सांवली और बहुत हँसमुख है।सुबह-सुबह वह अपनी बेटी को स्कूल छोड़ती है फिर माँ-बेटी एकसाथ काम पर निकलती हैं।अब तो जैसे उसके जीवन मे बहार आ गयी है।काम करते-करते भी मोबाइल हाथ से नहीं छूटता।
रजत ने एक बार मानसी को इस बात पर छेड़ा भी था कि "अगर आदमी हमेशा तरह हँसता रहे तो लोग पागल समझते हैं लेकिन अगर औरत हमेशा हँसती रहे तो बदचलन समझे जाने की संभावना बढ़ जाती है,तुम भी तो हँसती रहती हो,ज़रा सावधान रहना,इल्ज़ाम लग सकते हैं।"आक्रमण ही सबसे अच्छी सुरक्षा है।फौरन मानसी ने आक्रमण किया "और अपनी बहन के बारे में क्या कहोगे,वो भी तो दांत दिखाकर हँसती रहती है!क्यों हो गयी बोलती बंद! हँसने वालों का दर्द किसी को नहीं दिखता।"
गुलाब के जाने के बाद मानसी ने रजत को बताया कि " शिखा विदा हो चुकी है,अपने को भी कार्ड दिया था पर अपने को एकदमसे बेटी के पास जाना पड़ा।इतने सालों तक माँ-बेटी ने साथ काम किया है,विदाई का दुख तो होगा।
रजत के मुँह से निकला "अच्छा दूसरी बार विदाई।"
कपिल शास्त्री।
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