'जागी बदन में ज्वाला सैय्यां तूने क्या कर डाला' (संस्मरण)
'जागी बदन में ज्वाला,सैय्यां तूने क्या कर डाला!'
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भई!हमने क्या कर डाला !जब-जब जो-जो होना है,तब-तब वो वो होता है।सब कुछ पहले से ही लिखा हुआ है।हम तो सिर्फ निमित्त मात्र हैं।तो हमे क्या पता था कि ये गुनाह-ए-अज़ीम,ये महापाप,ये अनर्थ भी अब हमारे ही हाथों से होना लिखा है।
अमिताभ बच्चन जी जब घायल हुए थे उसके बाद लोगों ने पूछ-पूछकर पुनीत इस्सर को परेशान कर डाला था।आज भी वो यही कहते हैं "कोई भी ये जानबूझकर नहीं करता है,ये हो जाता है। इट हेपन्स।" बच्चन साहब ने ही कोका-कोला पी-पी कर अपनी आतें कमजोर कर लीं थीं।
वैसे भी अपन कमजोर दुनियादारों की श्रेणी में आते हैं तो कम से कम चाय तो अच्छी से अच्छी बना कर उसकी भरपाई करने की कोशिश में रहते हैं।कमजोर दुनियादार के मायने हैं कि हम पाककला में निपुण नहीं हैं,हाट बाजार में सब्जी-भाजी के मोलभाव नहीं कर सकते।किसी से तकाज़ा नहीं कर सकते।शक्ल ही ऐसी है कि कोई भी ऐरा-गैरा बेवकूफ बनाकर चला जाय।यानी कि हमारी शक्ल से ही बेवकूफी टपकती रहती है।यानि कि चपल,चतुर,चालाक,होशियारी वाले गुणों का अभाव है।यही सबसे बड़ा अपराध है।'बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ,आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ।' या 'सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी,सच है दुनियावालों के हम हैं अनाड़ी' ये दो गीत अपनी शख्सियत पर बिल्कुल सटीक बैठते हैं।'दुनिया मे हूँ,दुनिया का तलबगार नहीं हूँ,बाजार से गुजरा हूँ,खरीदार नहीं हूँ' भी कह सकते हैं लेकिन शादी के बाद तो खरीदार बनना ही पड़ता है।अपनी पसंद की पौशाक न मिलने पर विभिन्न दुकानों से सिर्फ मोलभाव करके खाली हाथ लौट आने वाली घरवाली के सामने पर्याप्त संयम बरतना पड़ता है।
तो भाई पर्सनेलिटी डेवलपमेंट के लिए या हमें होशियार सिंह बनाने के लिए विवाह उपरांत से ही हमारी कमजोरियों को संज्ञान में लेकर श्रीमतीजी ने हमे अपने ट्रेनिंग कैम्प में डाल लिया था।लगा था कि "हाय!मैं अभागा अट्ठाइस साल तक ही युवा रह पाया फिर स्लेट-बत्ती लेकर हाफ पैंट में घने भंवर काले बालों वाली टांगे लिए टाट-पट्टी पर बिठा दिया गया एक विद्यार्थी बना दिया गया हूँ जिसे श्रीमतीजी के ब्लैकबोर्ड पर अभी दुनियादारी के पाठ सीखने बाकी हैं।
मालवी बोली का एक शब्द है 'तोकना' यानी व्यवहार रखना या अटेंड करना।जैसे एक डील की गई थी कि "अगर मैं तुम्हारे रिश्तेदारों को तोकूँगी तो तुम्हे भी मेरे रिश्तेदारों को तोकना पड़ेगा।" यानि कि ये परस्पर प्रक्रिया में भी आप को कुछ व्यवहारिक गुणों का विकास करना पड़ेगा।शादी होते साथ ही बिना बीज बोए ही अनेक नए रिश्ते नए चेहरों के साथ उग आते हैं।ये फलाने हैं,ये फलाने के फलाने हैं और वो फलाने के फलाने के फलाने हैं जैसे रिश्तों को समझने में दिमाग का दही हो जाता था लेकिन एक अरुण गोविल वाली मर्यादा पुरुषोत्तम राम की स्माइल बनाये-बनाये सर दुखने लगता था फिर कहीं दूर जाकर एक फुक्की मारते थे तब जाकर कहीं चैन मिलता था।
एक कमजोरी आपत्तिजनक थी कि "अक्सर तुम्हारा हाथ माइक पर चला जाता है।"बॉडी लैंग्वेज सुधारने के मामले में सख्त निर्देश थे कि सार्वजनिक स्थानों पर या नाते-रिश्तेदारों के बीच तुम्हारा हाथ गलती से भी माइक पर नहीं जाना चाहिए। यानी बेवक़्त सर उठाने वाली खुजलिओं पर हमें नियंत्रण करना है।अब हमारी गड्डी श्रीमतीजी के गेराज में थी तो उस्ताद की बात तो मानना ही था।एक निर्देश और था कि प्यार-मोहब्बत तो ठीक है लेकिन अपने उत्तेजित माइक का प्रयोग यकायक बगैर सूचनार्थ नहीं करोगे।तो भाई क्या इसमे भी कोई नोटिस पीरियड की दरकार है!
'हम वो परवाने हैं जो शम्मा का दम भरते हैं,आह भी निकले तो ये प्यार की रुसवाई है' की तर्ज़ पर दूसरी सख्त आपत्ति यह थी कि स्वादिष्ट भोजन भरपूर डकार जाने के उपरांत डकार या पों का भोम्पू अगर बज जाय तो ये श्रीमतीजी द्वारा प्रेम से बनाये गए भोजन की रुसवाई है।इस पर भी अंकुश लगाना होगा।
तकाज़े के मामले में एक मजेदार किस्सा कभी भुलाये नहीं भूलता।वी.सी.आर.का युग था,उसे ससम्मान टी.वी.के साथ संलग्न करके घर बैठे फिल्मो का आनंद लिया जाने लगा था।माता-पिता हम नए नवेलों को तन्हा छोड़कर नाते-रिश्तेदारों से मिलने भ्रमण पर निकल गए थे।हमे तो मानो मन माँगी मुराद मिल गयी थी।'ये तन्हाई हाय रे हाय जाने कब आये न आये,थाम लो बाहें,थाम लो बाहें।' 'आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूँ,प्रेम नगर की डगर दिखा दूँ' की शरारती चाल को अमली जामा पहनाने का सुनहरा अवसर हाथ लग गया था।इस बार फिर मैंने बगैर सूचनार्थ वी.सी.आर.वाले को पोर्न फिल्म लाने का न्योता दे दिया था।भयभीत शख्स की एक ही गुजारिश थी कि "दे तो दूँगा पर 'कहना न तुम ये किसी से।' मैंने भी कभी नहीं,कभी नहीं,कभी नहीं की मुद्रा में मोटी गर्दन इधर-उधर हिलाकर उसे आश्वस्त किया था।
घर आया दुबला-पतला शख्स एक तो पहले ही भयभीत था ऊपर से अनभिज्ञ श्रीमतीजी उससे तकाज़े पर उतर आयीं कि "भाईसाहब,प्रिंट अच्छा होना चाहिए,नहीं तो पूरे पैसे नहीं देंगे हाँ।" वो अगले-बगले झाँकने लगा और मुझसे गुजारिश की कि "भाभीजी को दूसरे रूम में भेज दें ताकि मैं आपको प्रिंट क्वालिटी दिखा सकूँ।" कक्ष से निकल जाने के नम्र निवेदन को विस्मयाबोधक हावभावों के साथ शंका से देखकर "क्यों" पूछा गया तो काम से पहले ही क्रोध ने हावी होकर कहा कि "निकल जाओ रूम से।"इस पर श्रीमतीजी भुनभुनाते हुए निकल गईं।बाद में फिर पहले से सूचित न करने को लेकर सुनना पड़ा।
दुनिया के समक्ष हमें प्रस्तुतेबल बनाने के लिए श्रीमतीजी के निर्देशों का पालन किया तो वाहवाही भी मिली कि "भाई लड़की ने बदल तो दिया।"
तो यादों से निकलकर फिर वर्तमान में आ जाते हैं। अपन ने भी इस ठंड की शरुआत पर अदरक,काली मिर्च की स्वादिष्ट चाय खूब उकाल-उकाल कर बैडरूम में ले गए और नींद की खुमारी से अभी-अभी उठीं श्रीमतीजी के सिरहाने पलंग के माथे पर रखी।उँगली कप के कुंदे में उलझी और कप की खोलती हुई चाय श्रीमतीजी के नरम-नरम हाथ से होती हुई बिस्तर पर ढुल गयी।गरमागरम चाय ने एक क्षण में ही त्वचा जला दी।वो चीख कर उठ बैठीं और जोर-जोर से चिल्लाने लगीं।मैंने फौरन नल के पानी से हाथ धोने के लिए कहा फिर मैं फौरन बरनाल लेने भागा।लेकिन सिर्फ बरनाल लगा लेना ही काफी नहीं था।
हॉस्पिटल के गेट के सामने कार लगाकर मैंने इन्हें पहले उतार दिया फिर कार पार्क करने चला गया।काफी आगे जाकर जगह मिली।पैदल लौटने में थोड़ा वक्त लगा तो बीच मे ही श्रीमतीजी का फ़ोन आ गया कि जल्दी आओ।यहाँ बहुत प्रश्न पूछ रहे हैं और तुम्हें बुला रहे हैं।पहले श्रीमतीजी ने पतिव्रता स्त्री की तरह चाय ढुल जाना कारण बताया तो डॉक्टर देखकर समझ गए कि कोई भी खुद अपने हाथ पर चाय नहीं ढोलेगा, अगर ढुलती भी होगी तो बदन पर ढुलती।फिर स्पष्ट किया कि हस्बैंड से ढुल गयी।दरअसल हॉस्पिटल को सब कारण लिखने पड़ते हैं।एम.एल.सी. रिपोर्ट को साधारण दुर्घटना नहीं बता सकते इसलिए काफी शक के दायरे में आ गए थे।मैंने भी स्वीकार किया कि मेरे से ही हुआ है।
फौरन एंटी टेटनस व दर्द निवारक इंजेक्शन दिया गया व ड्रेसिंग कर दी गयी।डॉक्टर ने भी बताया कि कुछ लोग सिर्फ बरनाल लगाकर संतुष्ट हो जाते हैं।कई बार इससे इन्फेक्शन फैल जाता है।एंटी टेटनस लगाना भी आवश्यक है।एंटीबायोटिक दवा भी दी गयी हैं।दो तीन दिन ड्रेसिंग भी चलेगी।
पीड़िता का बयान बहुत मायने रखता है।'सफर' फ़िल्म में शर्मिला जी के पति फ़िरोज़ खान शेयर बिज़नेस में भारी घाटा होने के कारण जहर खाकर आत्महत्या कर लेते हैं।शक पत्नी पर जाता है।सास का एक बयान कि "वो खुद जहर तो खा सकती है लेकिन किसी को खिला नहीं सकती"से ही वो छूट जाती हैं।
दूसरी तरफ गलत बयानी के भी किस्से हैं। कॉलोनी में हमारे घर के सामने बने ग्राउंड में ही जुग्गी बस्तियों से अशिष्ट अलंकारों के मंत्रोच्चार के स्वर अक्सर गुंजायमान होते रहते थे।लेकिन उन्हीं में से रवि एक ऐसा सदाचारी था जिसने कभी कोई नशा-पत्ता या गाली भी नहीं बकी।वो उसी बस्ती में एक किराने की दुकान चलाता था।कुछ दिनों के लिए दुकान बंद हो जाती फिर खुल जाती थी।पता पड़ता कि पहली वाली के पास गया तो दूसरी ने रिपोर्ट कर दी।दूसरी वाली के पास गया तो पहली वाली ने रिपोर्ट कर दी।दूसरी वाली पहले अरुण की पत्नी हुआ करती थी।जब अरुण शहर छोड़कर गया तो रवि को सुपुर्द करके गया।निज़ी संबंधों के मामले में अति आधुनिक उच्च वर्ग और निम्न वर्गों में काफी समानताएं देख सकते हैं।दोनों से मोहब्बत करना ही उसका जुर्म था।
अपनी बच्ची उस दुकान को अपने बाप की दुकान ही समझती थी और मनचाही टाफियां बोतले खोलकर ले आती थी।बाद में पता पड़ता कि आपकी सुपुत्री आयी थी जो इतने की टाफियां ले गयी है।
बहरहाल हाथ जलने की खबर बेटी और नाते रिश्तेदारों में भी आग की तरह फैल गयी।''रहते थे कभी जिनके दिल मे हम जान से भी प्यारों की तरह,बैठें हैं उन्ही के कूचे में हम आज गुनाहगारों की तरह।
कपिल शास्त्री।
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