ज़िन्दगी मेरे घर आना (लघुकथा)

ज़िन्दगी मेरे घर आना
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"सुनो,मैं तो पड़ी हुई हूँ,अब तुम अपना ख्याल रखना,हमेशा मास्क लगाकर रखना।"
"मैं तो अपना ख्याल रख रहा हूँ,तुम्हारी बात करने में साँस फूल रही है।इसलिए कम बात करो।ज्यादा कॉल रिसीव मत करो।"
"हाँ,जब भी ऑक्सीजन की नली निकालकर बाथरूम जाती हूँ और साँस फूलने लगती है।"
"दवाइयाँ चल रही हैं,धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।थोड़ा हिम्मत से काम लो।"
"हाथ मे केन्यूला लगा दिया है।उसमें इंजेक्शन पर इंजेक्शन घोंप रहे हैं।मैं दर्द से तड़प उठती हूँ।कुछ इंजेक्शन तो सीधे पेट में घोंप देते हैं।"
"हाँ,ये तकलीफ तो सहनी पड़ेगी।इंट्रावेनस, इंट्रामस्क्युलर और चमड़ी के नीचे दिए जानेवाले तीनों इंजेक्शन्स लगेंगे।"
"लगता है अब मैं नहीं बचूँगी।शायद आखरी वक्त तुम्हें देख भी न पाऊँ।"
"कैसी बातें कर रही हो!कितने लोग रिकवर कर गए हैं।घबराओ मत सात-आठ दिनों में नेगेटिव हो जाओगी।मैं तुम्हारे लिए एक महंगा इंजेक्शन लेने जा रहा हूँ।उससे हालत में जल्द सुधार होगा।"
"ज़रा सा पीठ दर्द भी होता था तो तुम मेरी मालिश कर देते थे।नहीं भी होता था तो मैं बोलती थी कि मुझे कुछ-कुछ कर दो और तुम्हारे स्पर्श से मुझे कुछ-कुछ होने लगता था।"
"हाँ,आज तो पास भी नहीं आ सकते और कुछ-कुछ होता है भी नहीं गा सकते।"
"सुनो,तुम वीडियो कॉल पर आओगे,तुम्हें कुछ दिखाना है।"
"वॉइस कॉल पर ही तुम्हारी फूलती हुई साँसों को सुनकर मेरा दिल बैठा जा रहा है।लगता है साँसों से साँसे जुड़ी हुईं थीं।वीडियो कॉल पर तुम्हारा हमेशा खिला-खिला मुस्कुराता हुआ चेहरा काला पड़ता हुआ नहीं देख पाऊँगा।"
"फिर भी आओ।"
"हाँ,ये देखो यहाँ एक खिड़की है उसके बाहर की लोकेशन देखकर समझ लो।यहाँ से मैं जाने से पहले अलविदा करूँगी।"
"नहीं!तुम्हें लौटकर आना है।एक ज़िन्दगी मेरे घर से गयी थी और ज़िन्दगी मेरे घर आना।"
कपिल शास्त्री।

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