सहूलियत (लघुकथा)

सहूलियत (लघुकथा)
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मैं मोबाइल पर फेसबुक में मगन था।दरवाज़े पर एकाएक हुई खटखट से तारतम्यता भंग हुई।पत्नी पूजा कर रही थी तो दरवाज़ा मुझे ही खोलना पड़ा।बीस लीटर मिनरल वाटर की कैन दरवाज़े पर ही रखकर और अपने दोनो हाथ पीछे बांधकर वो लड़का ढीट जैसा खड़ा था।
आज वो लड़का नहीं था जो हर एक दिन छोड़कर टेलिफोनिक आर्डर पर पानी दे जाता है और मेरे एक बार दिए गए निर्देश कि "कैन किचन प्लेट पर रख कर जाओ।"का पालन करता हैं।"
किचन प्लेट पर भी इस तरह रखवाता हूँ कि उसका नल थोड़ा बाहर रहे ताकि मैं आसानी से गिलास या बोतल भर सकूँ।बीस साल पहले हुई स्लिप डिस्क के कारण आज भी कोई भारी चीज़ उठाने पर रीढ़ की हड्डी में दर्द आ जाता है।
"ये किचन प्लेट पर रख दो।"मेरे आदेश का त्वरित पालन करने के बजाय उसने आश्चर्य से देखा तो मुझे क्रोध आ गया।मैंने अब ज़रा रूखेपन से ऊँची आवाज़ में अपना आदेश दुहराया "खड़े-खड़े देख क्या रहे हो,इसे किचन प्लेट पर रख दो।"और उसकी ओर पीठ करके कैन के किचन प्लेट पर स्थापित होने का निरीक्षण करने लगा।
उसने अनमनेपन से कैन उठाकर मेरे करीब से निकलते हुए किचन प्लेट पर रख दी।तब तक पत्नी भी पूजा करके आ चुकी थी।मेरे पास खुल्ले चालीस रुपये नहीं थे तो मैंने उन्हें देने का बोलकर फिर बिस्तर पर लेटकर मोबाइल की आभासी दुनिया मे खो गया।
"तुमने उससे इतनी भारी कैन किचन प्लेट पर रखवाई!"पत्नी की डाँटती हुई कर्कश आवाज़ ने एक बार फिर तारतम्यता भंग की।
"क्यों क्या हुआ!हमेशा ही तो रखवाता हूँ।"मैंने उस फटकार पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए पूछा।
"तुमने देखा नहीं!उसके दाएं हाथ मे उँगलियाँ ही नहीं थीं।उसने बाएं हाथ से उठाकर और उस टुंडे हाथ को ही नीचे लगाकर जैसे तैसे कैन को रख दिया।"श्रीमतीजी के इस व्यक्तव्य ने मुझे भीतर तक आत्मग्लानि से तो भर दिया था लेकिन मैंने थोड़ी तफ्तीश करते हुए पूछा "मुझे तो नहीं दिखा, तुम्हें कैसे दिख गया?"
जब वो कैन उठाकर रख रहा था तभी मैंने देख लिया था और मैंने जब उसे दस रुपये के चार नोट दिए तो वो गिन नहीं पाया,ऐसे ही रख लिए।"पत्नी की पैनी दृष्टि ने संवेदनहीनता के मामले में मुझे घेर लिया था। फिर भी मैंने अपना बचाव करते हुए  कहा "मैं नहीं उठा सकता था।"
"तो दोनो मिलकर उठा लेते।"पत्नी ने परिस्थितिवश सहयोगात्मक रूख अपनाने की बात कहकर मुझे निरुत्तर करने की कोशिश की।
"फिर भी वो जवान था और मैं अधेड़।"ये तो निश्चित ही मेरा कुतर्क था जो उन्हें चिढ़ाने के लिए ही था।
"तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता।"चिढ़कर पत्नी  ने वार्तालाप का पटाक्षेप एक हताशा के साथ किया।कैन तो स्थापित हो चुकी थी पर फिर मेरी तारतम्यता  स्थापित नहीं हो पाई।

कपिल शास्त्री।
भोपाल 13.11.2020

सहूलियत (द्वितीय भाग)
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पानी मंगवाने पर आज फिर वही लड़का खड़ा हुआ था जिससे मैंने अनभिज्ञता में जबरन कैन किचन प्लेट पर रखवाई थी।कैन दरवाज़े पर रखकर आज उसने अपना टुंडा हाथ मुझे दिखा भी दिया।पत्नी बाहर ऑनलाइन क्लास लेने गयी हुई थी।घर मे हम बाप-बेटी ही थे इसलिए बहुत शांति भी थी।मैं भी मोबाइल पर नहीं था इसलिए कोई तारतम्यता नहीं टूटी।
आज दरवाज़े पर ही वो बीस लीटर की कैन मैंने सहर्ष स्वीकार की।सोफासेट पर बैठकर लैपटॉप पर काम कर रही बेटी ने देखा तो बोली "इसे किचन प्लेट पर रखवाओ।"मैंने उसे इशारे से चुप रहने के लिए कहा।लड़के के जाने के बाद मैंने बेटी को बताया कि आज फिर वही लड़का था जिसके एक हाथ मे उँगलियाँ नहीं है।
कैन को किचन तक खींच कर ले गया फिर उसे किचन प्लेट पर रखने के लिये बेटी से मदद चाही।आज मैंने उसकी तारतम्यता भंग की थी।वो अपना आफिस वर्क छोड़ना नहीं चाहती थी तो बोली "पापा कोई इतनी भारी भी नहीं होती है कि आप अकेले रख न सको।"बात दिल पर लगी।याद आया बचपन में घूमकर आने के बाद अपार्टमेंट की पचपन सीढ़ियों के आने पर नींद आने का नाटक करते हुए बोलती थी "पापा मुझे गोद में ले लो।"पचमढ़ी,हिमाचल के कितने पहाड़ उसे गोद में लादे-लादे चढ़े थे।कई बार कंधे पर काट भी लेती थी।

कमर में नस आ जाने की संभावना को दरकिनार करते हुए मैंने कैन उठाकर किचन प्लेट पर अकेले ही रख दी।
लड़के का आज अपना टुंडा हाथ दिखाना ऐसा लगा जैसे वो उस दिन की मेरी संवेदनहीनता के जवाब में बिना कुछ बोले अपनी लाचारी प्रगट कर रहा है। फिर भी संवेदनशीलता के मामले में एक संतोष प्राप्त हुआ और बेटी के कटुवचन से एक आत्मविश्वास भी जागा।

कपिल शास्त्री।

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