कल के सपने आज भी आना (व्यंग्य)
कल के सपने आज भी आना
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कल के सपने आज भी आना।तो ज़नाब कल का सपना यह था कि मैं अकेला मानव और मेरे अपार्टमेंट के ही आसपास घूमने वाला काला कुत्ता एक चढ़ते हुए फ्लाईओवर पर अकेले पैदल ही जा रहे हैं।कहीं कोई वाहन नहीं है।बाकी दुनिया नीचे से जा रही है।फ्लाईओवर आकाश की ओर जा रहा है।
जी हाँ, बिल्कुल युधिष्ठिर के तरह की फीलिंग आ रही थी लेकिन सपने में मैं वृद्ध नहीं अभी की तरह अधेड़ ही हूँ।अधेड़ावस्था में ही बिना मरे ही मनुष्य से देवता बनने की खुशी मन मे हिलोरे मार रही थी।सपने में अगर मेरे पास मोबाइल होता तो मैं फौरन फेसबुक पर पोस्ट बनाकर शेयर करता और शीर्षक रखता 'मनुष्य से देवता बनने की यात्रा।' बहुत सी हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं मिलतीं।हूरों या शास्त्रीय नृत्य की पौशाकों में नृत्य करती अप्सराओं को देखने की कोई लालसा नहीं थी।सनी लियोनी के 3x वीडिओज़ देखने के बाद ये नृत्य तो अत्यंत उबाऊ व अरुचिकर लगेगा।जैसे बटर चिकन खाने के बाद घास फूस खा रहे हों।वैसे भी इतनी लिमिटेड अप्सराओं को ही किसी ऋषि की तपस्या भंग करने के लिए फील्ड वर्क पर भेज दिया जाना और इतने सारे देवताओं द्वारा भोग किया जाना अप्सराओं का शोषण है।निश्चित ही मैं ऊपर जाकर अप्सराओं के पक्ष में इसके खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करूँगा और इंद्र का सिंघासन हिलाकर रख दूँगा।मैंने अपनी योजनाएं तैयार कर ली थीं।
संभव है देवता ब्लैक लेबल और शिवाज़ रीगल से भी उत्तम क्वालिटी की मदिरा का सेवन करते हों।संभव है ऊपर जाकर मैं चिरयुवा हो जाऊँ और मुझे नवांकुर या नवोदित देवताओं में डालकर इस उत्तम गुणवत्ता वाली मदिरा से वंचित कर दिया जाय।सबसे बड़ी खुशी तो इस बात की थी कि अब कमाने के लिए रोज़-रोज़ काम नहीं करना पड़ेगा।फेसमास्क से भी मुक्ति मिल जाएगी और बार-बार सैनिटाइजर से हाथ भी साफ नहीं करने पड़ेंगे।फिर ख्याल आया कि सिर्फ दो महीने के लॉकडाउन के दौरान ही बिना काम किये इतने पक गए थे कि दिमागी संतुलन बिगड़ने वाला था तो देवता लोग कैसे बिना काम के हमेशा सभा मे बैठकर सिर्फ नृत्य ही देखते रहते हैं!
कई तरह की संभावनाएं दिमाग में आ रहीं थीं।संभव है मेरी तरह के ही कुछ सीधे,सच्चे,निष्पाप लोग कुत्ते के साथ जा चुके हों और कुछ जाने वाले हों।लेकिन सोचने वाली बात यह थी कि स्वर्ग की सशरीर यात्रा हेतु ऐसे कुछ चंद लोगों के लिए सरकार एक अलग से फ्लाईओवर क्यों बनाएगी!क्या किसी प्राइवेट कंपनी के साथ डील हो गयी है?जैसे हबीबगंज रेलवे स्टेशन का कायाकल्प बंसल ग्रुप द्वारा किया जा रहा है।आगे कुछ प्राइवेट ट्रैन भी शुरू हो जाएंगी जिनका किराया सामान्य ट्रेनों के बनिस्बत बीस प्रतिशत अधिक होगा।
वैसे ही कोरोना पेशेंट के मुफ्त इलाज का खर्च सरकार झेल रही है उस पर इस अनोखे फ्लाईओवर का खर्चा और चढ़ गया।मानो न मानो ये ज़रूर गर्त में जा रही अर्थव्यस्था के सुधार के लिए किसी बड़े प्राइवेट ग्रुप से डीलिंग ही होगी।ये विचार आते ही मेरी पेशानी पर चिंता की लकीरें ये सोचकर उभर आयीं कि कहीं इसका भारी-भरकम किराया मुझसे तो न वसूला जाएगा!कितनी जगह टोल टैक्स लगेगा?वैसे पैदल यात्रियों से टोल टैक्स नहीं लिया जाता लेकिन ये रास्ता तो पैदल यात्रियों के लिए ही है और वो भी स्वर्ग का रास्ता है तो मुफ्त में तो कुछ होगा नहीं।कुत्ता तो कुछ देगा नहीं बल्कि इसका पेट भरने के लिए रास्ते भर मुझे ही इसे खिलाना-पिलाना पड़ेगा।संभव है एक मानव के साथ एक कुत्ता फ्री की स्कीम हो।अगर स्वर्ग के द्वार तक पहुँचने के लिए वाहन सुविधा या अपनी गाड़ी ले जाने की अनुमति होती तो कितना अच्छा होता!वेलट पार्किंग मिल जाती तो तो सोने पर सुहागा हो जाता।
यह भी संभव है कि पहले कुछ सीधे,सच्चे लोगों को लुभाने के लिए मुफ्त यात्रा की स्कीम चलाई गई हो और सर्वप्रथम मेरा ही चयन किया गया हो और पृथ्वी पर मेरे बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए गए हों कि भाई लोगों देखो युधिष्ठिर के बाद सशरीर स्वर्ग जाने वाला दूसरा व्यक्ति कपिल शास्त्री है।
संभव है इससे प्रभावित होकर भविष्य में कुछ साधन-संपन्न लोग सशरीर यात्रा के लिए स्वेच्छा से तैयार हो जायें।धन-संपत्ति सब अपने नाम करा लेने के बाद संभव है बहु-बेटों द्वारा अवहेलना झेल रहे वृद्धों का समय से पूर्व ही बंदोबस्त करा दिया जाय। ये भी संभव है कि ये बहुत बड़ा फ्रॉड हो,फ्लाईओवर बीच मे ही खत्म हो जाये और मैं लटक जाऊँ या मुझे ऊँचाई से धक्का दे दिया जाय।कोई स्वर्ग में जाकर तो अपने संस्मरण सुनाएगा नहीं और ये लोग क्रेडिट ले लेंगे कि हमने सशरीर स्वर्ग पहुँचाया।कुत्ता तो वापस चला जायेगा फिर इसी कुत्ते का इस्तेमाल वो दूसरे यात्री के लिये कर लेंगे।करोड़ों का बिज़नेस बन जायेगा।
सशरीर स्वर्ग जाने की खुशी फुर्र हो गयी और अनेक प्रश्न दिमाग मे कौंधने लगे।कोई साइन बोर्ड भी नहीं था जो बताये की कितना किलोमीटर है न ही कोई व्यक्ति था जिससे अपने प्रश्नों व शंका का समाधान हो सके।कहीं इस शाही यात्रा के लिए जबरन तो लोन सैंक्शन नहीं कर दिया गया जिसका मैं भुगतान भी नहीं कर पाऊँगा।संभव है मेरी पत्नी और बेटी से इसका भुगतान कराया जाय और न करने पर अखबारों में नाम के साथ तस्वीर लगा दी जाए।संभव है तमाम इलेक्ट्रॉनिक चैनल वाले मेरी पत्नी को घेरकर तीखे सवाल पूछें कि "अपने पति को सशरीर स्वर्ग भेजकर आपको कैसा लग रहा है?"संभव है पत्नी जवाब दे कि "बहुत अच्छा लग रहा है।सम्पूर्ण पृथ्वी पर एक मेरा पति ही सीधा, सच्चा प्रमाणित हुआ है।ये तो न सिर्फ मेरे लिए बल्कि समस्त नाते-रिश्तेदारों व दोस्तों के लिए गर्व का विषय है।यधिष्ठिर की पौराणिक उपलब्धि के बाद सम्पूर्ण विश्व के लिए यह एक महान ऐतिहासिक उपलब्धि है।वैसे भी उनका मन इस दुनिया मे नहीं लग रहा था तो मैंने लोन लेकर उन्हें सशरीर स्वर्ग भिजवा दिया।लोन तो जैसे-तैसे चुका देंगे।कार, मकान,फ्रिज,टी.वी.सब तो लोन पर ही था,सब चुका दिया।अच्छा हुआ पिंड छूटा।"संभव है अनेक पत्नियाँ उसे फ़ोन करके अपने पतियों को भी भेजने के बारे में किश्तों की रकम व लोन प्रक्रिया के बारे में पूछ पूछकर दिमाग खा जाएँ। संभव है कुछ ईर्ष्या भी करें और सड़ा मुँह बनाकर कहें कि "इसका पति तो फेसबुक पर कुछ भी झूटा-सच्चा लिखता रहता था।ये कहाँ से सीधा,सच्चा साबित हो गया!सब पैसों का खेल है सखी।" संभव है लोन में ही सीधा, सच्चा साबित करने की अतिरिक्त प्रोसेसिंग फीस ली जाय या ऐसे सरकारी विभाग खुल जाएं जहाँ मुट्ठी गरम करके सीधा,सच्चा साबित करवाया जा सके।संभव है कुछ लोग पत्नी को बदनाम भी करें कि "ध्यान से देख लो इस डायन को इसने ही अपने पति को सशरीर स्वर्ग का रास्ता दिखा दिया।संभव है कुछ पत्नियों के लिए खतरा उत्पन्न हो जाये कि कहीं उनके पति तो उन्हें सशरीर स्वर्ग भेजने की तैयारी में तो नहीं!
हालाँकि पुराणों में किसी महिला के सशरीर स्वर्ग जाने का उल्लेख नहीं मिलता इसलिए ऐसा निष्कर्ष निकाला जाता है कि कोई भी महिला ऐसी नहीं हुई जिसने कभी झूट नहीं बोला हो।कुंती ने भी झूठ नहीं बोला था बस सच नहीं बताया था इसलिए युधिष्ठिर ने ही अपनी माता को श्राप दिया था कि "अब से कोई भी औरत कोई बात अपने पेट मे नहीं रख पाएगी।" मेरी पत्नी भी नहीं रख पाएगी और जिनको नहीं मालूम होगा उन्हें भी फ़ोन करके विस्तार से बताएगी।तीसरे दिन मेरा ऑनलाइन उठावना होने वाला है इसकी पूर्व सूचना व्हाट्सएप्प,फेसबुक पर दे दी जाएगी।कई प्रकांड विद्वानों का उद्बोधन रख दिया जाएगा जो मेरी शान में कसीदे पढ़ेंगे व इस ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए बधाई देंगे।आत्मा और शरीर तो साथ मे ही गए हैं तो कोई ये भी नहीं बोल पायेगा की ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे व परिवार को असीम दुख को वहन करने की शक्ति प्रदान करे।दशाकर्म में अस्थिविसर्जन का कोई सवाल ही पैदा नहीं होगा।तेरवीं में ऑनलाइन ही खीर पुड़ी,दही बड़े,लड्डूओं की तस्वीर पोस्ट कर दी जाय तो बेहतर होगा।कर्मकांड के पंडितों में भय व्याप्त हो जाएगा कि अगर ऐसे ही सब सशरीर स्वर्ग जाने लगे तो हमारा क्या होगा!अब ये संभव-वम्भव नहीं बल्कि यकीन है कि कुछ राम भक्त हनुमान बनकर निरुपम वाटिका में श्रीमतीजी के आसपास मंडराने लगें।
ऐसे उलजुलूल खयाल आने पर मैं फ्लाईओवर पर आगे न जाकर पीछे भागने लगा हूँ और चिल्लाने लगा हूँ "मुझे नहीं जाना स्वर्ग सशरीर,सशरीर...स श...स श...स श !
रात में श्रीमतीजी हड़बड़ाकर उठ बैठीं,पानी पिलाया और पूछने लगीं "क्या स श,स श,बड़बड़ा रहे थे?
कपिल शास्त्री।
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