अबोध (लघुकथा)
अबोध
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अपार्टमेंट के ग्राउंड फ्लोर पर रहने वाले साल भर के अबोध लड्डू को इतना तो बोध तो था कि अगर वह उसके फ्लैट के सामने से गुजरते हुए,प्यार जताते,पुचकारते,उसके गाल सहलाते अड़ोसी पड़ोसियों की गोद मे चला गया तो उसे बाहर की दुनिया भी दिख जाएगी।
अंकिता आज कॉलेज से लौटते हुए उसकी मम्मी की अनुमति लेकर कुछ देर के लिए टॉप फ्लोर पर उसे खिलाने अपने घर ले आयी थी।अचानक उसे देखकर अंकिता की मम्मी नेहा का भी वात्सल्य प्रेम जाग उठा था।अंकिता ने उसके गाल सहलाते हुए मम्मी के सामने एक प्रश्न रख दिया-"मम्मी मैं अगर ऐसा ही प्यारा सा बच्चा पैदा कर लूं और शादी नहीं करूं तो!"
मम्मी कुछ पल के लिए भौचक्की देखती रह गईं फिर उन्होंने एक प्रश्न रखा-"अच्छा बता तू मम्मी के साथ रहना चाहती है या पापा के साथ?"अंकिता कुछ पल के लिए अनुत्तरित रह गयी फिर बोली "ये कैसा सवाल है?"
"बता, बता, तू किसके साथ रहना चाहती है?"मम्मी ने अपना सवाल दुहराया।कुछ पल असमंजस में रहने के बाद बेटी बोल पड़ी-
"दोनो के साथ।"किसी एक पाले में न जाते हुए उसने आत्मविश्वास के साथ जवाब पेश किया।
"बस मिल गया जवाब! तेरा बच्चा भी यही चाहेगा।"नेहा ने एक पप्पी अबोध के गालों पर रखते हुए बेटी की आशंका समाप्त कर दी थी।
कपिल शास्त्री।भोपाल।
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