प्रेम का बोध (लघुकथा)
प्रेम का बोध (लघुकथा)
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"अब तो मैं कोरोना से लड़कर वापस आ चुकी हूँ, अभी भी दाढ़ी बढ़ाकर ऐसे मातम मना रहे हो जैसे मैं मर गयी हूँ।लगता है यही चाहते थे।सब लोग तुम्हारे प्रति सहानुभूति जता रहे हैं कि देखो!भाईसाहब ने अपना क्या हाल कर लिया है।"
"अरे भई, अपनी खेती है,थोड़े दिन बढ़ी भी रहे तो क्या हर्ज है!शादी से पहले की बात है एक बार मूँछे काट ली थीं तो बहन ने यह कहकर चिढ़ाया था कि "लगता है घर में कोई दूसरा ही इंसान आ गया है।मम्मी ने सड़ा मुँह बनाया था और पिताजी भी गुस्से से दहाड़े थे कि "जा अब जाकर सर भी मुंडा ले।"लोग हमें जिस स्वरूप में देखते रहते हैं वैसा ही देखते रहना चाहते हैं।"
"पापा,अब आप फ्रेंच कट रख लो।"
"ये देखो,बेटी ने अब एक नई मांग रख दी।"
"खैर इस दौरान मुझे ये तो समझ मे आ गया कि तुम बाप-बेटी मुझसे कितना प्यार करते हो।"
"तुम्हारी डूबती हुई साँसों को सुनकर,तुम्हें खोने के डर से मैं सिहर गया था।दाढ़ी की तरह ही बीवी को भी घर की खेती ही मानकर चल रहा था,जब चाहे तब काटो।"चलती का नाम गाड़ी और बढ़ती का नाम दाढ़ी।जब गृहस्थी की चलती हुई गाड़ी में अचानक ब्रेक लगा तो बोध हुआ कि अब ये सौंदर्यबोध वाला व शारीरिक आकर्षण वाला वो जवानी का प्यार नहीं था बल्कि गृहस्थी व मेरे प्रति तुम्हारे समर्पण को महसूस करके होने वाला नया प्रेम जागृत हुआ है।"
"तुम्हारा लड़ना-झगड़ना,कोसना,ताने मारना, रूठना-मनाना यही हलचलें तो ज़िन्दगी थीं।मैं अपने आप को कोसने लगा था कि कहीं मैंने भगवान से शांति तो नहीं मांग ली थी!सब कुछ साँसों पर ही टिका हुआ है।लड़ो खूब लड़ो और लड़ियाती रहो।"
कपिल शास्त्री।
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