सभ्यता का अहंकार (लघुकथा)
"सभ्यता का अहंकार" (लघुकथा)
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हर दिन की तरह होली की सुबह भी शांत सी ही थी।रागिनी घर में ही बने गूँजे,मठरी,मिठाइयां आने वालों के लिए डाइनिंग टेबल पर सजा रही थी।पति अभय ने कहा "कोई पुराने पेंट शर्ट निकाल दो,कुर्ते तो फट जाते हैं,होली है तो क्या हुआ!मज़ाक की भी हद होती है,लोगबाग असभ्यता पर उतर आते हैं,वो रंगो से मुझे वैसे ही एलर्जी है,साइनोसाइटिस भी बढ़ जाती है और वो लाल रंग तो कितना भी घिसो निकलता ही नहीं है,वार्निश भी लगा देते हैं और ठन्डे पानी से तो वैसे ही शरीर में करंट दौड़ जाता है,अब पैतालीस की उम्र में ये सब शोभा देता है क्या!,कोई आये तो बोल देना उनकी तबियत ज़रा ठीक नहीं है।"
रागिनी बोली ठीक है तुम अंदर जाओ मैं संभाल लूंगी,जब बुलाऊँ तो आ जाना और गुलाल लगा देना।"
होली का खुमार चढ़ते ही टोली आ धमकी "भाभीजी,होली है,होली है,बुलाइये भाईसाहब को बाहर।"
"देखिये उनकी तबियत ज़रा............"रागिनी ने पतिदेव को बचाने का प्रयास किया।
"अरे इस बार सिर्फ गुलाल से भाभीजी"टोली ने आश्वस्त किया तो अंदर से सुन अभय जी भी बाहर आ गए और गुलाल लगा और लगवाकर सबके गले मिले।"शर्मा जी ने विश्वास में लेकर लाल रंग बालों में उंडेल दिया,फिर वर्मा जी ने वार्निश और व्यास जी ने काले रंग से और अरोरा जी ने नीले रंग से चितकबरा बना दिया।अभय जी अरे अरे करते रह गए।फिर किसी ने रंग भरी बाल्टी से पूरा नहला दिया।
अब अभय जी ने अपने पुत्र को आवाज़ लगाई "बिट्टू,निकाल अपने भी रंग,अब मैं भी बताता हूँ,ऊर्जा का संचार हो चुका था उन्होंने भी तबियत से सबकी पुताई की फिर ढोल वाले के साथ सब मिल जुल कर नाचे।रागिनी को भी चितकबरा बना दिया।रागिनी बोली "सबह तो बड़े सभ्य बन रहे थे अब क्या हुआ?"
मुस्कुराते हुए फ़रमाया " सुबह तक वो सभ्यता का अहंकार था,रंगो ने सब धो डाला,अब मेरी शकल भले ही बन्दर जैसी लग रही है पर बहुत हल्का लग रहा है।बुरा न मानो होली है।"
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कपिल शास्त्री.भोपाल।
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