ब्लडी अतिसंवेदनशील (संस्मरण)

ब्लडी अतिसंवेदनशील  (संस्मरण)
******************************************
'फड़फड़,फड़फड़'
'हट, हट'
फिर 'फड़फड़, फड़फड़'
फिर 'हट, हट'
पहले कुछ दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा।एक्सहॉस्ट फैन का खाली पड़ा गोला मालिए तक पहुँचने का उनके लिए  सुगम रास्ता था।फिर किचन में जाओ तो फड़फड़ा कर उड़ जाते थे।मालिए पर एक सीधा रखा झोला और एक आड़े रखे झोले के पीछे की जगह उनके लिए सबसे मुफीद थी।
'खड़गसिंह के खड़कने से खड़गती थीं खिड़कियां और खिड़कियों के खड़कने से खड़कता था खड़गसिंह' वाली हालात हो गयी थी।वो हमसे डर रहे थे और हम उनसे।फिर स्थिति ज़रा गंभीर हो चली थी।अब 'हट'हट'वाली साधारण फटकार असरकारक नहीं थी।समझ गए कि एक माँ बाप अंडों की रखवाली कर रहे हैं इसलिए अब डर नहीं रहे हैं।हमने भी हट-हट करना छोड़ दिया था।बस ऑनलाइन क्लासेज के दौरान उनके किसी मुद्दे पर आपस में लड़ाई-झगड़ा होने पर पर बच्चों की तरह डाँटकर चुप कराया था तो चुप भी हो गए थे।
फिर कुछ दिनों में चूजों की चीं चीं चीं चीं सुनाई देने लगी लेकिन वो दिखे नहीं।फिर एक दिन दो दो प्यारे से चूज़े झोले के ऊपर दिखे।कबूतरी उनकी चोंच में चोंच डालकर खिलाती थी।बाप की चोंच में कुछ नहीं होता था फिर भी उसकी चोंच में चोंच डाल देते थे।बाप को बड़ी मुश्किल से अपनी चोंच छुड़ानी पड़ती थी फ़र्ज़ करो कि अगर मनुष्यों में बाप को दूध पिलाना पड़े तो क्या हालात होंगे!परेशानी का जिक्र करने पर कामवाली बाई ने कहा भी कि "मुझे दे दो,पका कर खा लेंगे,वैसे भी मेरा पति रोज़ दारू पीने के बाद मुझसे ही मुर्गा बनवाकर कर खाता है।कबूतर भी खा सकते हैं।"हम जमकर हँसे कि "अरे नहीं,हमने उन्हें पनाह दी है।"
अब उनके बड़े होने तक और सम्वेदनशील बने रहना था।हल्के भूरे पंख धीरे-धीरे काले होते गए फिर उसी एक्सहॉस्ट फैन के गोले से एक दिन वो भी उड़ गए।हमने राहत की साँस ली।लेकिन ये क्या हुआ!कैसे हुआ!कब हुआ! क्यों हुआ?अब क्या बताएँ!
फिर गंभीर वाली स्थिति आ गयी।हट-हट बेअसर थी।हे भगवान फिर दो चूज़ों को और उनके माँ-बाप को झेलना पड़ेगा।ये तो अति हो गयी।हमारी सम्वेदनाओं के साथ खिलवाड़ हो रहा था।हमें ग्रांटेड ले लिया गया था।ये तो मुँह लग गए।एक तो इतने दिन उनकी गंदगी झेली और चाय,खाना बनते समय उनकी फड़फड़ाहट से उनके पर व गंदगी गिरने का खतरा उठाते रहे फिर भी इंसानियत के नाते चुप थे।हमारे घर को व्यभिचार का अड्डा बना लिया था।कबूतरी इतनी जल्दी-जल्दी प्रेग्नेंट होकर आ जाती थी।जी किया कि इसे गुलाब बाई को दे ही दें पर मन नहीं माना।
एक्सहॉस्ट फैन के गोले पर काली शीट चिपका दी गयी तो खिड़की की ग्रिल में से फँस-फुसाकर जैसे-तैसे निकल आये।खिड़की बंद कर दी तो शीट पर और खिड़कियों पर चोंच मार-मारकर गुटरगूं करते थे मानो हमारे दिल पर दस्तक दे रहे हों कि "अरे, अतिसंवेदनशील खोल खिड़की,हमें हमारे बच्चों से मिलने दो।"दिन भर मन कड़ा किये रहे फिर रात में खिड़की खोल दी।अंततः कचरा ले जाने वाले लड़के को कुछ पैसे देकर उन दो चूज़ों को एक कार्टन में रखकर जिसमे कुछ मुरमुरे के दाने डालकर ऊपर छत की टंकी पर यह सोचकर रख दिया गया कि माँ-बाप उन्हें ढूँढ़ ही लेंगे लेकिन नहीं वह उन्हें यहीं तलाशते रहे और चोंच मारकर चिल्लाते रहे "अरे,ब्लडी अतिसंवेदनशील,बता हमारे बच्चे कहाँ हैं?"
फिर अगले दिन छत पर गए तो देखा कि वह दोनो उसी कार्टन के आसपास बैठे हुए हैं।चूज़ों की चहचहाहट से अंततः माँ-बाप ने ढूँढ़ ही निकाला।अब लग रहा था जैसे कह रहे हों "मानना पड़ेगा,संवेदनशील तो हो।"
कपिल शास्त्री

Comments

Popular posts from this blog

नानीजी का घर (किस्से-दर-किस्से)

चांटा (लघुकथा)

'नहीं...कभी नहीं' (कहानी)