रिवर्स में पिताजी
रिवर्स में पिताजी
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"आन दो,आन दो"की आवाज़ पर कृष्ण भगवान बने उस बहरूपिये पर विश्वास करके मैं बेफिक्र होकर रिवर्स ले रहा था।घर के आगे की रोड पर आगे कुछ निर्माण कार्य चल रहा था इसलिए रिवर्स लेना मजबूरी थी।पीछे घरों के बाहर ही खड़ी कारों से बचाना भी था।ग्रीन बेल्ट के नाम पर रहवासियों ने अतिक्रमण भी कर रखा है जिससे रोड और संकरी हो जाती है।
अब और तेजी से रिवर्स लिया तो पीछे की सीट से एक डाँटती हुई आवाज़ आयी "गधे तेरे से कहा था कि मेरा डेथ सर्टिफिकेट बनवा दे मगर तूने नहीं बनवाया।"ये मेरे पिताजी थे।मैंने भी चिढ़कर जवाब दिया "क्यों ऊपर भी दिखाना पड़ रहा है क्या?
आपके मरने के बाद बनवा लिया था और आपकी एफ.डी.आर. तुड़वा कर छोटी को आधे पैसे भी दे दिए थे।अब आप तो अपने जीते जी बनवाने की ज़िद कर रहे थे तो कैसे बनवाता,कोई मेरे बाप की खेती है।आज तक मैंने आपको कभी जवाब नहीं दिया पर आज खूब खरी-खरी सुनाने का मन है।
याद कीजिये आप की यादाश्त भी कमजोर हो चली थी। खाना खाने के बाद भी बोलते थे कि "आज तो हमने खाना ही नहीं खाया,आपको खाई हुई थाली भी दिखाते थे तो बोलते थे कि ये तो तुम लोगों की खाई हुई होगी।मम्मी को तो आप भूल ही गए थे।आपने देख लिया था कि मम्मी का डेथ सर्टिफिकेट हॉस्पिटल से मिला है तो आप को भी अंतिम समय मे अस्पताल न जाना पड़े इसलिए आप पहले ही बनवा लेना चाहते थे।
वैसे आप पहले भी अस्पताल चलने को तैयार नहीं थे लेकिन आपकी कमजोरी को देखकर हम पति-पत्नी आपको जबरन ले गए थे।वहाँ डॉ. ने आपको कमजोर वृद्ध समझकर भर्ती तो कर लिया था परंतु वहाँ भी आप अपनी झगड़ालू प्रवत्ति से बाज़ नहीं आये थे।आई.सी.यू.में आप पड़ोस वाली मरीज़ पर क्रोधित होते हुए कहते थे कि "दुष्ट औरत जब देखो पर्दा खोल देती है।वह हमें घूर कर देखती थी और फिर हमें उसके हाथ-पैर जोड़ने पड़ते थे।आपकी उम्र 80 के पार हो चुकी थी इसलिए डॉक्टर ने किसी भी न्यूरोलॉजिकल ट्रीटमेंट न देने की सलाह दी थी जिसका हम पालन कर रहे थे।दो दिन बाद डॉक्टर ने भी हाथ जोड़ लिए थे कि "सब कुछ नार्मल है सिर्फ प्रोटीन की कमी है,मैं किस चीज़ का इलाज करूं!"आपको ज़िन्दगी में पहली बार अस्पताल में भर्ती हुआ देखकर तमाम नाते-रिश्तेदार भी आपको गंभीर समझकर देखने आए थे परंतु उनसे भी आपने एक मरीज़ की तरह व्यवहार नही किया बल्कि और सुनाया कि "तुम्हे अब फुरसत मिली है मिलने की।"आपका सम्मान करते हुए वह कुछ नहीं बोले मगर सब हँसते हुए बाहर निकल रहे थे।मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था।आप तो आई.सी.यू.के लायक ही नहीं थे।जबरन दस हज़ार ठुकवा दिए थे।
एक बार जब आपने अपना डेन्चर घुमा दिया था तो हम कितने चिंतित हो गए थे की अब आप कैसे खा पाएँगे! उस पर सितम यह कि आप डेंटिस्ट के पास चलने को भी तैयार नहीं थे।मैं टेक्नीशियन को हाथ-पैर जोड़कर घर लाया था और नाप दिलवाया था।जब नया डेन्चर बन गया और दस हज़ार ठुक गए तो पता नहीं कहाँ से आपने जादू से वो पुराना डेन्चर निकालकर दिखा दिया।
सेल वाली दीवार घड़ी कबकी आ चुकी थी परंतु फिर भी आप हमसे वही पुरानी घड़ी में स्टूल पर चढ़ाकर चाबी भरवाते रहे।भरते-भरते कलाइयों और हाथ मे दर्द होने लगता था।मम्मी तो ज़िन्दगी भर आपके गुस्से से डरती ही रहीं फिर भी आपकी तारीफ करती थीं कि ये दिल के बुरे नहीं हैं,बस सारा शरीर सोने का करके नाक पीतल की कर लेते हैं।
गुड्डी जीजी ने सिर्फ एक बार आपको पलट कर जवाब क्या दे दिया था तो आपने उनसे ज़िन्दगी भर बात नहीं की।शादी के बाद जब वो विदा हो रहीं थीं तब भी आप पीछे से रो रहे थे लेकिन न गले लगाया न बात की।मैंने भी आपके क्रोध के डर से आपसे दूरी बना ली थी पर आपके हर आदेश का पालन करता रहा।आप अपने तख्त पर बैठे-बैठे आदेश करते थे कि ये ले आना वो ले आना और मैं अपनी एक अदद साईकल से वो हाज़िर कर देता था।
अपने अहम की खातिर अगर हम अपने बच्चों से जीत भी जाएँ तो वो कैसी जीत और हार भी जाएँ तो कैसी हार।आप सिर्फ स्वयं के लिए सम्मान चाहते थे पर दूसरों को हमेशा ज़लील ही किया।
मुझे भी शादी के बाद एक भय था कि आपका डी.एन.ए. तो मुझमे भी आएगा।कहीं मेरे रिश्ते भी अपने अहम के कारण बीवी बच्ची से बिगड़ न जाएँ इसलिए मैं अपनी एकमात्र बच्ची के साथ बचपन से ही बहुत मित्रवत रहा। जब वो मुझसे कुश्ती लड़ती थी तो जानबूझकर मैं उससे हार जाता था और वो खुश हो जाती थी।पत्नी के साथ भी सामंजस्य बिठाकर चला।हालाँकि आप मुझे जोरू का ग़ुलाम ही कहते रहे।
आपने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से पाँच स्वर्ण पदक प्राप्त करने के बाद भी कोई सरकारी,अर्धसरकारी या प्राइवेट नौकरी नहीं की।खैर किसी की नौकरी करना तो आपकी फितरत ही नहीं थी।ज़िन्दगी भर आप अपने बनाये गए कम्फर्ट जोन में ही जीते रहे।इस जोन में रहने वाला व्यक्ति अपनी नकारात्मकता का भी आनंद लेता है।उस जोन में ज़रा सा खलल पड़ने पर आप तिलमिला जाते थे।आप बस एक ही रोना रोते रहे कि हमारे बाप हमारी सौलह साल की उम्र में मर गए थे।
हाँ,ये एक कम्फर्ट ज़ोन वाला अवगुण तो कुछ-कुछ मुझमे भी है लेकिन मैंने पंद्रह साल नौकरी भी की जिसमे ये जोन रोज टूटता था।नौकरी में सुनना तो पड़ता है पर सैलरी एक स्त्रोत भी बन जाता है जो हर महीने का सहारा होता है।ये स्त्रोत आपके शासनकाल में नदारद था।
मेरी शादी के बाद आपने अपनी बहु को बेटी जैसी तो क्या एक इंसान जैसी भी नहीं समझा।बाथरूम छोटा था उसमें नहाने के बाद साड़ी नहीं पहनी जा सकती थी।इस पर आप अत्यंत क्रोधित होते हुए बोले थे-"तुम्हारी जोरू हमारे सामने चनिया-पोलका में आ जाती है।" अरे तो आप देखते ही क्यों थे?
उसके अंगवस्त्र भी आपको डोरी पर सूखते हुए नहीं दिखने चाहिए थे इसलिए बिचारी बैडरूम में खिड़कियों के सरियों पर डालकर पंखे की हवा से सुखाती थी और ऊपर से पर्दा डाल देती थी।हमारी अनुपस्थिति में आपने रिश्तेदारों को बेंत से पर्दा हटा-हटा कर वो दिखाए।यहाँ तक कि आपने उन्हें गर्भनिरोधक के पैकेट तक दिखा दिए और हमे "कितने बेशर्म हैं"साबित करने की कोशिश की।उनकी भी शर्म के मारे नज़रें झुक गयीं परंतु आपको शर्म नहीं आयी।
आपने हमे घर छोड़ने के लिए विवश कर दिया था।आपकी मृत्यु पर शमशान घाट पर आपके लिए कुछ अच्छा बोलने के लिए किसी नाते-रिश्तेदार के पास दो शब्द भी नहीं थे तब मामाजी के निर्देश पर सिर्फ दो मिनिट का मौन रखा गया था।
"हाँ बेटा, अंतिम समय मे मैं हाथ जोड़कर तुम दोनों से इन पापों की माफी मांग रहा था लेकिन आवाज़ ही चली गयी थी।"पिताजी का वह दयनीय चेहरा याद आ गया।
जीवन के अंतिम पलों में ही आपका पश्चाताप झलका।आपका जिद्दीपन टूटा।तब तक तो पूरा परिवार भी टूट चुका था।याद है जब आपने अपनी बूढ़ी चाची अम्मा को धक्के देकर घर से निकाल दिया था तो उन्होंने जाते-जाते श्राप दिया था कि बर्बाद हो जाओगे और वही हुआ भी।गुड्डी जीजी किडनी फेलियर से गयीं फिर मम्मी कैंसर से गयीं,जिस दामाद पर आपको बहुत भरोसा था वो भी पी-पी कर लिवर सिरहोसिस से चले गए,आपकी छोटी बेटी विधवा हो गयी।
"आन दो,आन दो"की आवाज़ पर अब मैंने और रिवर्स लेने से मना कर दिया था।बहरूपिया हँसते-हँसते धीरे-धीरे ओझल होता जा रहा था और मैं चिल्ला रहा था "अरे अपने पैसे तो लेते जाओ।"पत्नी ने झिंझोड़कर उठाया,पानी पिलाया और बोली "क्या बड़बड़ा रहे हो,किसे पैसे दे रहे हो?"
"पिंडदान करने से क्या वाकई आत्मा को शांति मिल जाती है!लगता है पिताजी अभी भी सपने में कुछ कहना चाह रहे हैं।अब हमें उन्हें दिल से माफ करना होगा।"
कपिल शास्त्री।
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